Thursday, March 31, 2011

अप्रैल फूल

१ अप्रैल को पूरे देश में लोंग एक दूसरे को अप्रैल फूल यानी मुर्ख दिवस  मनाते है. लेकिन मुझे लगता है शायद इस देश की जनता को रोज मूर्ख बनाया जाता है. कभी नेता इलेक्शन से पहले किये वादे के लिए मूर्ख बनाता है तो कभी अधिकारी दफ्तरों के रोज चक्कर लगाने के लिए मूर्ख बनाते है, कभी सैलरी के नाम पर तो कभी मोह्ल्ले में हो रहे सुधारों के नाम पर. हम हमेशा ही मूर्ख बन जाते है और हमेशा ही मूर्ख दिवस मनाते है. और किसी ना रूप में रोज मूर्ख बन जाते है. अब आर, टी , ई, को ही ले लीजिए जब क़ानून लागू हुआ तो हमें लगा की गाँवों में भी शिक्षा का स्तर बढेगा लेकिन, न ही शिक्षा का स्तर बढ़ा और ना ही कानून लागू होने से १४ साल के बच्चो को शिक्षा का अधिकार मिला.सरकार ने भले ही पोलिथीन पर बैन कर दिया हो लेकिन आज देख लीजिए  पोलिथीन बैग  मार्केट में उसी मात्रा में दिख रहे है | जैसा की पहले धूरूम्पान की चीजो आदि पर भी कितने प्रतिबन्ध लगा दिए गये है लेकिन ये सारी चीजे मार्केट में वैसे ही उपलब्ध है जैसे की पहले बिक रही थी. दूकानों पर भले ही गूठके भले ही नदारद हो पर गैर कानूनी रूप से ज्यादा पैसे में सब मिल रहा है. लोंग भले ही इस दिन एक दुसरे को हसने हसाने के तरीके ढूढ़ रहे हो पर हम रोज किसी न किसी रूप में अप्रैल फूल मनाते है.      

Sunday, March 27, 2011

ITIHAAS JITNA PURANA HAI LUCKNOW

लखनऊ   कहीं  नजाकत  में  है  तो  कहीं  शानो शोकत  में  है   तो कहीं   आवध   की शान   में है तो कहीं तहजीब  की पहचान  में है अगर  ध्यान  से  देखो  तो यह  नवाबो  की  नगरी  के  पहचान  है यह नजाकत और शानो शोकत  और तहजीब लखनऊ की आबो हवा में फ़ैली है | 
                                                                                               इतिहास के मिथक लोक और विस्वास और किवदंतियों में सदीयों से एक पुरातन नगरी के रूप में वीक्यात लखनऊ में  कितना किचाव है की इसकी प्राचीनता का गौरव आमीट है जब सारा का सारा शेहरी वैभव प्रदेशो की राज्धानियो मरीं सिमटा जा रहा हो , अपनी ऐटीहासिक, पोरंनिक , अध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ जीवीत शेहरो में लखनऊ ने अभी तक अपनी गारीमा नही खोई है 
                                                इसके अलावा यहा का संगीत पुराने लखनऊ शहर के कुछ प्रमुख स्थान जैसे बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा , रूमी गेट, नौबत खाना , फिरंगी महल, टीले वाली महजिद , गोमती नदी का कीनारा , गूल दरवाजा जो की अपने इतिहास के लिए काफी मशहूर है | यह की  तन्धई और पान, बढकर मस्ती की सारी हदे तोडती जीवन शैली हमारे अन्दर हलचल सी पैदा करती है | तहजीब की बात करे तो समूचे देश में देखने को मिलती है| किन्तु लखनऊ शहर की तहजीब खिन और देखनो को नही मिलती | यहा के कई राजा और मुग़ल अपनी तहजीब के लिए विख्यात है | 
                                                                     टीले वाली महजिद जिसे टीले वाली महजिद इस लिए कहा गया है क्युकी कभी यह लखनऊ के सबसे उचे स्थान पर था | लखनऊ शहर को छोटा काशी के नाम से भी जाना जता  है | क्युकी यहा चौक अरीया में लगभग ६४ मंदिर है | जिसमे मुख रूप से नागनाथ , विश्व्नात ,शिव मंदिर , शीतला माता का मंदिर  जो काफी  पुराने मंदिर है | यहा के दो मंदिर श्री काले राम मंदिर और शीतला माँ का मंदिर जिसमे काले राम मन्दीर की यह विशेषता है की सीता जी जो की हमेशा राम की दाई ओर होती है वही इस मंदिर में बी और उनकी श्थापना की गयी  है |   और दुसरा शीतला मंदिर में जहा और मंदिरों भगवान् की पूजा पुजारी करते है वही इस मंदिर  में   पूजारन होती है जो माँ की पूजा अर्चना करती है | जो भुत अद्भूत और चोका देने वाली बात है | 
                                     आजादी के समय की बहूत सारी ख़ुफ़िया मीटिंग भी लखनऊ शहर के फिरंगी महल में हुई है | जहां गांधी जी के साथ बहूत सारे क्रान्तिकारियो ने खुफिया तौर पर कई अनोदोलन  की योजना तैयार की है  वो स्थान आज भी मौजूद है | लखनऊ शहर टोलो में बटा था कटोरी टोला , नेपाली टोला, सब्जी मंडी, अकबरी दरवाजा, फूलो वाली गली, आदि इन टोलो की अपनी एक  विशेषता होती थी|  हर एक टोला एक दुसरे से भिन्न था  और इसकी भिन्ता ही इस्की विशेषता होती थी | हर एक तोले का रहन सहन भी अलग- अलग था | नौबत खाना जिसका मतलब होता था की जब भी कोई वी. ई. पी. आता था तो नगाड़े बजे जाते थे | आज भी पुराने लखनऊ में लोंगो के घरो के बाहर मछली  बनी  हुई है  जिसके मुह से कभी  एंजेल्स  निकलती बनी हुई है तो कहीं आग निकलते बनी हुए है जिसका मतलब है की वो दुःख, सुख और गुस्सा प्रकट करना चाहती है | आज यह चीजें भले हमारे घरो के बाहर न मिलती  हो लेकिन पुराने लखनऊ में आज भिओ घरो के बाहर मछली बनी देखाई देती है | 
                       अवध की सर जमीन लखनऊ को मुगलों के शाशनकाल से आज तक सहमे अवध कहकर याद करने का सिलसिला आज भी है |









   






Sunday, March 13, 2011

बातो बातो में बदलती ज़िन्दगी

जी हां हम बात कर रहे है बातो बातो में बदलती ज़िन्दगी की | आप को नही लगता  हमारी ज़िन्दगी में जो कुछ भी बदलाव आ रहा है या हो रहा है उसमें कुछ हद तक हमारी बाते ही होती है | अब जैसे किसी ने कहा के मुझे फिल्में देखना बहुत पसंद है  तो उसमें फिल्म की बात हुई फिल्म की बात होने से जाहिर है की ज़िन्दगी का जुड़ाव तो जरूर होगा, रंग होगे, सपने होगे , गीत होंगे और डांस होगा मतलब एक शब्द या एक वाक्य में कहू तो बदलते दौर  की वो सारी चीजे होगी जिसे हम अपनी ज़िन्दगी जोड़ना कहते है अब चाहे वो विज्ञापन क्यों न हो क्योंकी  फिल्म है तो एड होना तो जरूरी है ऐसे भला टी.वी और सीरिल्स  की बातें तो जरूर होगी| सीरिल्स है तो साजिस ,कहानी और क्यों भला हम कैसे भूल सकते है इनका होना तो अनिवार्य है भला हमारी ज़िन्दगी में भी तो ये सारी चीजे होती ही  है फिल्मो में भी हमेशा सोसाइटी से जुड़े  ही मुद्दे लिए जाते है और वो समस्याए भी आम आदमी के ज़िन्दगी से जुडी होती है जिससे काफी हद तक ये समस्याए सुलझ जातीं है| और हमारी आपकी की ज़िन्दगी में बदलाव आता है |